वन संरक्षण की संस्कृति

 

घटते वन क्षेत्र से आज पूरी दुनिया चिंतित है। कोई ओजोन परत में छेद होने से, तो कोई जंगल में मौजूद प्रचुर जैव-विविधता के संरक्षण के लिए चिंतित है। लेकिन हजारों साल से वनों पर आश्रित आदिवासियों की चिंता इससे बिल्कुल अलग है। आदिवासी तो सिर्फ अपने अस्तित्व और आने वाली पीढि़यों की खुशहाल जिंदगी के लिए जंगल बचाना चाहते हैं। आधुनिक समाज की सोच ने जीवन को लाभ की वस्तु बना दिया है, लेकिन आदिवासियों के लिए जंगल एक पूरी जीवन शैली है। आजीविका का साधन है। संरक्षण के नाम पर संयुक्त वन प्रबंधन जैसे आधारहीन कार्यक्रम से वनों का संरक्षण तो कम हो रहा है, उल्टे तनाव बढ़ता जा रहा है। वन संरक्षण में आदिवासियों का दृष्टिकोण काफी महत्वपूर्ण है। जिस पर न तो अमल किया जा रहा है और न ही उसे मान्यता दी जा रही है। आदिवासियों की जीवनशैली, कार्यशैली में जंगल के दोहन का उनका तरीका अलग है। अपने नियम कायदों से वे पुरखों के जमाने से जंगल बचाते आ रहे हैं। आदिवासी अपने जरूरत के अनुसार जंगल से जितना लेते हैं, बदले में उसे कुछ-न-कुछ देते हैं। इनकी इसी भावना और जंगल के प्रति उनके आदर से आज वन बचे हुए हैं। जंगल का उपयोग करने में आदिवासियों के तरीके और नियम से महसूस होगा कि वन संरक्षण में उनकी सोच कितनी टिकाउ और महत्वपूर्ण है।

 उल्लेखनीय है कि जंगल आदिवासियों का महज आर्थिक आधार ही नहीं है, बल्कि उनकी बीमारियों का पूरा इलाज भी जंगली जड़ी-बूटियों से ही होता है। मंडला और डिंडौरी जिलों के बैगा आदिवासीदेश भर में जड़ी-बूटी व वनौषधियों के सबसे अच्छे जानकार माने जाते हैं। उनका जंगल से जड़ी-बूटि निकालने के तरीके को जानने के बाद यह अहसास होता है कि जंगल के प्रति उनके मन में कितना आदर व संरक्षण करने की भावना है। दुर्भाग्य से आधुनिक समाज ने इस सोच को दरकिनार कर दिया है। बैगा आदिवासी जचकी (प्रसव) के दौरान कल्ले की छाल का उपयोग करते हैं। छाल निकालने के पहले वृक्ष को दाल, चावल का न्यौता देते हैं। फिर धूप से उसकी पूजा करते हैं और वनस्पति महाराज (वृक्ष) के लिए मंत्रोच्चारण करते हैं। इसके बाद एक बार में कुलहाड़ी के वार से जितनी छाल निकलती है, उतनी ही दवा के रूप में उपयोग करते हैं। जानकार बैगाओं के मुताबिक इस तरीके से काफी कम छाल निकलती है। वे मानते हैं कि अगर बिना किसी नियम के छाल निकाले जाएं, तो लोग मनमाने ढंग से छाल निकालने लगेंगे। इससे वन संपदा का नुकसान होगा। इसी तरह पेट-दर्द, उल्टी-दस्त व आंव के लिए महुआ का छाल और पंडरजोरी का छाल का इस्तेमाल होता है। महुए के पेड़ से एक बार कुल्हाड़ी मारने पर और पंडरजोरी से तीन बार कुल्हाड़ी मारने पर निकली छाल, दवा के लिए उपयोगी मानी जाती है।

इसी तरह सिरदर्द (अधकपारी) होने पर तिनसा झाड़ की छालका उपयोग किया जाता है। तिनसा वृक्ष छाल एक सम्पूर्ण विधि के तहत निकाली जाती है। सूर्योदय से पहले, शौच और पेशाब करने से भी पहले तिनसा की छाल निकालनी होती है। इसके लिए पेड़ से एक निश्चित दूरी बनाकर सांस रोककर एक पत्थर उठाते हैं और पेड़ के तीन चक्कर लगाकर उसे पेड़ पर तीन बार ठोंकते हैं। इसके बाद कुल्हाड़ी के एक वार से जितनी छाल निकलती है, उसे लेकर पुनः जहां से पत्थर उठाते हैं, वहीं रखना होता है। इस बीच अगर सांस टूट जाए तो दवा बेअसर मानी जाती है। इस प्रक्रिया के चलते एक ही सांस में सारी गतिविधियों के कारण बहुत कम छाल निकल पाती है और पेड़ सुरक्षित रहता है। बैगा आदिवासी अलग-अलग बीमारियों में अलग-अलग छाल या जड़ का इस्तेमाल करते हैं और हर दवा निकलाने का उनका तरीका, नियम और विधि अलग-अलग होते हैं। लेकिन किसी भी जड़ या दवा निकलाने से पहले दाल, चावल का न्यौता देना, धूप से पूजा करना व वनस्पति महाराज की प्रार्थना करना नहीं भूलते है। गौरतलब है कि धूप से पूजा करने के पीछे बैगाओं की धारणा यह है कि इससे वृक्ष के दवा वाले गुण सक्रिय हो जाते हैं। कई जडि़यों के लिए नारियल, गांजा व शराब भी चढ़ाई जाती है। अगर इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इसका दवा के गुण से सीधा संबंध नहीं निकलता, लेकिन आदिवासियों की सोच व दृष्टिकोण बिल्कुल भिन्न है। पूछने पर जानकार बैगा बताते हैं कि जो जंगल दवा देकर हमारी जान बचाता है, तो हमारा फर्ज बनता है कि हम भी उस जंगल को कुछ दें। उनकी यही भावना जंगलों के संरक्षण का मुख्य आधार है।

 अगर हम व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो इस तरह के नियम से, जिनमें सांस रोकना, पत्थर उछालना, एक बार कुल्हाड़ी का वार करना, सूर्योदय से पहले दवा निकालना, सांस बंद कर जड़ खोदना व निकालना आदि शामिल है, बहुत कम मात्रा से जड़ी-बूटियों का सीमित उपयोग किया जाए। अगर कोई चीज आसानी से मिलती है तो उसका जरूरत से ज्यादा दोहन होने और अंततः विलुप्त होने का खतरा हमेशा बरकरार रहता है। जंगल से अपनी जरूरतों के लिए कड़े नियम-कायदे बनाना ही उसके संरक्षण का सिद्धांत है। ऐसा न होने पर आसानी से पूरा पेड़ काटकर छाल निकाली जा सकती है, लेकिन इससे जल्द ही बेशकीमती वनौषधियों का नाश हो जाता। इसी प्रकार बैगा आदिवासियों का वन्य प्राणियों के प्रति भी इसी तरह का सम्मान और श्रद्धा है। आज दुनिया भर में शेरों के संरक्षण के लिए तमाम प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, लेकिन संभवतः बैगाओं ने दुनिया में पहली बार बाघ संरक्षण नीति अपनाई है। अगर किसी बैगा पर शेर हमला कर दे तो माना जाता है कि उस व्यक्ति से कोई बड़ी गलती हुई है या उसने जघन्य पाप किया है, जिसका उसे दंड मिला है। ऐसे व्यक्ति की गलती को पूरा बैगा आदिवासी अपने समुदाय की गलती मानकर बाघ देव की पूजा करते हैं। फिर ऐसी गलती न दोहराने का संकल्प लेते हैं। उल्लेखनीय है कि जंगल महज आदिवासियों का आर्थिक आधार ही नहीं है, यह उनकी सामाजिक व धार्मिक पहचान भी है। आदिवासियों के देव स्थान, पूजा स्थान जंगलों में ही होते हैं। यहां तक की आदिवासियों का अराध्य देव बूढ़ा देवदरअसल सागौनका वृक्ष है।

 छत्तीसगढ़ में सरना के जंगल आदिवासियों का तीर्थ स्थान है, जहां से एक पत्ता भी तोड़ना पाप माना जाता है। इसी तरह मध्यप्रदेश में बैतूल, छिंदवाड़ा जिलों में कोरकू, गोंड आदिवासी खंडेराज बाबा’ (मेघनाद) की पूजा करते हैं। यह गांव के बीच में लकड़ी के तीन बड़े-बड़े खंभे होते हैं। यहां होली के बाद पूजा होती है और मेला लगता है। अक्सर हर 10-12 साल में इन खंभों की जगह नए खंभे लगाए जाते हैं। नए खंभे लाने के तरीके में भी जंगल के प्रति आदिवासियों का सम्मान, श्रद्धा और लेन-देन की सोच दिखाई देती है। खंडेराय बाबा के खंभे लाने के लिए जंगल में बाबा के वृक्ष की पूजा करते हैं। दाल, चावल, शराब चढ़ाकर मुर्गों की बलि दी जाती है। फिर बाबा का वृक्ष काटकर गांव में स्थापित किया जाता है। जाहिर है कि ऐसा नियम न होने पर खंडेराय बाबा के नाम पर तमाम वृक्ष काट दिए जाते। आदिवासी समुदाय व प्रक्रिया महज अपनी धार्मिक गतिविधियों के लिए ही नहीं करते, बल्कि उनकी सामाजिक, आर्थिक जरूरतों के लिए भी इनकी उपयोगिता है। वन आधारित जीवनशैली, आदिवासियों का परंपरागत ज्ञान, जरूरत भर उपयोग, संरक्षण के लिए आदिवासियों की सोच और कार्यशैली की अनदेखी कर, उस पर विदेशी सोच आधुनिक कहकर लादी जा रही है। इससे वन्यप्राणी, जैव विविधता का संरक्षण तो नहीं हो रहा, उल्टे आदिवासी और जंगल का सहअस्तित्व जरूर खत्म हो रहा है। इससे तनाव बढ़ रहा है।

 जंगल से अधिक-से-अधिक लाभ कमाने के लिए आधुनिक सोच के तहत वन संरक्षण के लिए वन सुरक्षा समितियां, ग्राम वन समितियां, ईको विकास समितियां बनाकर जन भागीदारी से संरक्षण का सिर्फ ढोल पीटा जा रहा है। संयुक्त वन प्रबंधन, लोक वानिकी जैसे आधारहीन जन विरोधी कार्यक्रम वास्तव में ढकोसले हैं। अब तो ऐसी सोच विकसित की जा रही है कि जंगल बचाना महज लाभ के लिए हमें याद रखना होगा। देखा जाए तो हजारों साल से आज तक जंगल की जो रक्षा आदिवासियों की संस्कृति व परंपरा के चलते हो पाई है, उसका बड़ा हिस्सा हम महज कुछ दशकों में साफ कर चुके हैं। अगर वास्तव में आने वाली पीढ़ी के लिए हमें जंगल की विरासत रखनी है, तो जंगल को लाभ के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए बचाने का सोच विकसित करना होगा। जंगल का सम्मान करना सीखना होगा और अपने सोच, संस्कृति में बदलाव लाना होगा।

सुदीप सिन्हा

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