कुपोषित बच्चे बनाम कुपोषित व्यवस्था

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा किसी भी प्रदेश में कुपोषण के संकट से उपजी बच्चों की लगातार हो रही मौतों पर यह पहली जनसुनवाई थी। हालांकि अब आयोग ने साक्ष्यों और तथ्यों के बाद मान लिया है कि कुपोषण है, और इससे निपटने के प्रयास नाकाफी हैं। आयोग की अध्यक्षा शांता सिन्हा ने कहा कि व्यवस्था में आूमलचूल परिवर्तनों की जरूरत है। समन्वित प्रयासों से ही दूर होगा कुपोषण।  बच्चे मरते रहे, और प्रशासन सुप्तावस्था में ही रहा तो क्या ये राज्य प्रायोजित मौतें नहीं प्रतीत होती हैं ? यह सही है कि प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पहली बार कुपोषण चुनावी मुद्दा बना लेकिन बच्चों को बचाने की राजनैतिक चेतना का अभाव हर स्तर पर दिखता है। हर पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कुपोषण का जिक्र किया है, कांग्रेस ने तो कुपोषण मुक्त प्रदेश बनाने का संकल्प भी ले लिया था। लेकिन फिर भी बच्चों के पक्ष में बेहतर व्यवस्था बनाने की बैचेनी न तो पक्ष में ही दिखती है और ना ही विपक्ष में । दरअसल यह कुपोषण जितना बच्चों में है उससे ज्यादा व्यवस्था में है। आयोग तो अपना काम कर गया, अब देखना यह है कि यह कुपोषित व्यवस्था कब चेतेगी और सरकारें कब इन बच्चों की जान बचा पायेंगीे ?

जनसुनवाई, हमेशा से ही अपनी बात को सशक्त तरीके से कहलवाने का माध्यम रही हैं । लोग आते हैं, अपनी बात कहते हैं और तौलते हैं अन्याय और न्याय को अपने ही तराजू में । सरकार सामने हो या न हो, आपस में चर्चा करके रणनीति बनाना भी संघर्ष को और मुखर करता है। ये अलग हैं कि जनसुनवाईयों की अधिकता भी कई बार संघर्षों को कमजोर करती है और प्रषासन भी उसे गंभीरता से नहीं लेता है। लेकिन हर बार ऐसा ही होता हो, यह सही नहीं है। हाल ही में 10 फरवरी को मध्यप्रदेश के सतना जिले में भोजन का अधिकार अभियान व आदिवासी अधिकार मंच द्वारा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के समक्ष द्वारा की गई जनसुनवाई अपने आप में महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा किसी भी प्रदेष में कुपोषण के संकट से उपजी बच्चों की लगातार होती मौतों पर यह पहली जनसुनवाई थी।

मई 2008 से सतना जिले के उचेहरा विकासखंड की पुरैना पंचायत के हरुदआ और नगझीर गांवों में कुपोषण के कारण 6 बच्चों की मौतों का मामला सामने आया। हमेशा की तरह प्रशासन ने कुपोषण नहीं माना और समस्या का हल ढूंढने की अपेक्षा लीपापोती उचित विकल्प माना। स्थानीय संगठन आदिवासी अधिकार मंच के आनंद, प्रतीक भाई ने थोड़ी और खुखेस की तो पाया कि केवल दो गांव ही नहीं बल्कि यह पूरे सतना जिले की कहानी है। बच्चे लगातार मर रहे थे, और इनमें से 90 प्रतिशत बच्चे आदिवासी थे।  देखते ही देखते यह आंकड़ा अकेले सतना जिले में ही 63 हो गया। स्थानीय संगठन द्वारा प्रशासन को जिन गांवों में कुपोषित बच्चों के संदर्भ में सूचना दी और तत्काल कदम उठाने का निवेदन किया, उन्हीं गांवों में बच्चों की मौतों के मामले सामने आये। यानी प्रशासन ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया।  प्रशासन नेर् कत्तव्यहीनता को ही अपनी जिमेदारी माना। स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग दोनों ही एक दूसरे पर ढोलते रहे और इधर बच्चे मरते रहे । केवल सतना ही नहीं खंडवा, शिवपुरी और श्योपुर में भी यह तांडव हुआ और 352 बच्चों की मौत हो गई । प्रशासन ने फौरी तौर पर तो प्रयास किये लेकिन गंभीरता से समस्या को समूल नष्ट करने के प्रयास कहीं भी और किसी भी स्तर पर नहीं दिखे। क्या ये राज्य प्रायोजित मौतें नहीं प्रतीत होती हैं ? बहरहाल अलग-अलग स्तरों पर बात पहुंचाई गई, आदिवासियों ने पहली बार चुनाव का बहिष्कार करने की बात की। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को जनसुनवाई करने का प्रस्ताव दिया गया और अंतत: आयोग ने यह जनसुनवाई की। इस जनसुनवाई में आयोग की अध्यक्ष सुश्री शांता सिन्हा, सदस्य दीपा दीक्षित के साथ-साथ पोषण व स्वास्थ्य विषेषज्ञ  वंदना प्रसाद व सलाहकार स्वाति नारायणन ने लागों की बात सुनी। इस जनसुनवाई में 40 गांवों के 1300 से अधिक लोग आये। 

जनुसनवाई में अपनी बात रखने आईं दुदवार गांव की सोहनिया बाई ने बताया कि उसके दो बच्चे पहले कमजोर हुए, फिर बीमार हो गये। उनके इलाज के लिए उसने गहने भी बेच दिए, पर उन बच्चों की मौत हो गई। कई प्रस्तुतियों के बाद जब प्रशासन ने यह कहने की कोशिश की कि इतना कुपोषण नहीं है, तो उसी वक्त इमलिया गांव की फुलवा बाई अपने बच्चे के साथ कुछ कहने के लिए सामने आई। उसके बच्चे की स्थिति देखकर सभी चौंक गये। उसकी हालत बहुत ही गंभीर थी। उसे तत्काल पोषण पुनर्वास केन्द्र, सतना भेजना पड़ा। एक अन्य बच्चे की गंभीर स्थिति देख कर सीधे केन्द्र में रेफर करना पड़ा। भट्टनटोला के ब्रजलाल ने बताया कि उसका सात महीने का बेटा रामदीन सूखते-सूखते कमजोर होकर मर गया। कई अन्य लोगों ने भी अपनी प्रस्तुतियों में बताया कि उनके गांव में गंभीर कुपोषण है।

गहिरा गढ़िघाट के रामदास मवासी ने विकास की व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा कि आज हमारा गांव ब्लॉक से महज 5 किलोमीटर दूर है, पर पूरा गांव नाले का पानी पीने को मजबूर है। गांव के सभी परिवार भूमिहीन है, वहां अब तक स्कूल स्थापित नहीं हो पाया और हम बच्चों  को पढ़ाना चाहते हैं, इसलिए उन्हें दो नाले पार करके 3 किलोमीटर दूर दूसरे गांव के स्कूल में भेजते हैं। रोजगार और आंगनवाड़ी की तो वहां पहुंच ही नहीे है। ऐसे में पिछले दो माह में 35 परिवारों के गांव में दो बच्चों की मौत हो गई। किरहाई पुखरी गांव की दुर्गाबाई ने खड़े होकर बड़ी ही बेबाकी से यह कहा कि हमारे गांव में आंगनवाड़ी केन्द्र नहीं है और केन्द्र न होने से हमें 5 किलोमीटर दूर टंकी गांव जाना पड़ता है। दुर्गाबाई ने आयोग को बताया कि उनकी दो माह की बच्ची पूजा की मौत कमजोरी से हो गई । दुर्गाबाई ने  जो बताया उससे यह स्पष्ट हुआ कि उसकी बच्ची की मौत कुपोषण से ही हुई है।

लोगों को प्रेरित करने की जरूरत नहीं थी, जिन्होंने अपने बच्चों को खोया था, वो जानते थे कि उन्हें क्या बात करना है । वे बच्चों के कुपोषण के साथ-साथ व्यवस्था के कुपोषण पर भी बात कर रहे थे। कई लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि जनसुनवाई तो कुपोषण की थी, फिर लोग अचानक रोजगार गारंटी की, राशन व्यवस्था की बातें क्यों करने लगे ? पुरैना के लालमन ने बड़े ही सटीक ढंग से अपनी बात रखते हुये कहा कि हम लोग पहले से ही जंगलों/प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहे हैं। अब वहां से कुछ नहीं मिलता। भूमिहीन हैं। रोजगार गारंटी में काम नहीं मिलता, मिल भी जाये तो फिर मजदूरी एक-एक साल तक नहीं मिलती है। उन्होंने कहा कि राशन का कोटा 35 किलो से घटाकर 20 किलो कर दिया गया है। और इस  कटौती से हमारे सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया है। अब आप ही बताईये कि क्या खुद खायें और क्या बच्चों को खिलायें ? आंगनबाड़ियों से बच्चों को कुछ मिलता नही ंतो वे कमजोर नहीं होंगे तो क्या होगा? और कमजोर हुये तो फिर बीमारी से ऐसा मारेगी कि फिर बच्चा उठ कर खड़ा नहीं हो पाता है।

दरअसल सवाल केवल सतना, शिवपुरी और श्योपुर में कुपोषण से बच्चों की मौतों का नहीं है बल्कि सवाल तो यह है कि बच्चे की मौतें ही क्यों होती है ? ज्ञात हो कि प्रदेष की शिषु मृत्यु दर 72 है जो कि देश में सर्वाधिक है। प्रदेश में प्रतिवर्ष 1 वर्ष से कम उम्र के 1,33,000 शिशुओं की मौत हो जाती है, ये वे बच्चे हैं जिन्हें बचाया जा सकता है। प्रदेश में कुपोषण की स्थिति चिंताजनक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तृतीय चक्र के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में कुपोषण 54 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत है। मध्यप्रदेश में गंभीर कुपोषण की स्थिति (3 मानक विचलन से कम) सर्वाधिक है। मध्यप्रदेश में  12.6 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, जबकि भारत में 6.4 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं । मध्यप्रदेश में 1335600 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। प्रदेश में विगत् 32 माहों में 81,622 शिशुओं की मौत हो गई।  अकेले सतना जिले में पिछले 32 माहों में 4954 शिशुओं की मौत हो गई, जो कि प्रदेश में सर्वाधिक है।

सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्तों की रिपोर्ट की मानें तो प्रदेश में 0 से 6 वर्ष तक के बच्चों की कुल संख्या 1 करोड़ 10 लाख के आसपास है। समेकित बाल विकास सेवाओं के सर्वव्यापीकरण के लिये प्रदेश में 1 लाख 46 हजार आंगनवाड़ी केन्द्रों की आवष्यकता है, लेकिन प्रदश्ष में वर्तमान में केवल 69238 केन्द्र ही संचालित हैं । सरकार अभी भी  तीन चौथाई यानी 76.51 प्रतिशत बच्चों को ही कवर करती है, जबकि एक चौथाई बच्चे अभी भी इसकी पहुंच से दूर है। राज्य की मात्र 12985 आदिवासी बसाहटों तक ही आईसीडीएस योजना का लाभ पहुंच पाया है, जबकि अभी भी 4168 आदिवासी बसाहटें इस योजना के लाभ से वचित है। आईसीडीएस के समस्त हितग्राहियाें को लाभान्वित करने के लिए वर्तमान में आंवटित बजट राशि को छ: गुना तक बढ़ाना पड़ेगा। 2007-08 हेतु आईसीडीएस के अर्न्तगत 1320 करोड़ रूपयों की राशि की (2/रुपये प्रति हितग्राही- वच्चे, गर्भवती एवं धात्री महिलाओेंं तथा किशोरी बालिकाओं) की आवश्यकता थी, जबकि सरकार द्वारा मात्र 320 करोड़ की राशि ही आवंटित की गई है, उसमें भी पोषणाहार के हिस्से में मात्र 255.54 करोड़ (80 प्रतिशत) राशि ही आई । यही नहीं विभाग रिक्त पदों की किल्लत से जूझा रहा है, वर्तमान में  महिला एवं बाल विकास विभाग में  79 परियोजना अधिकारी (सी.डी.पी.ओ.) तथा 70 सहायक परियोजना अधिकारी (ए.सी.डी.पी.आ.) तथा 283 पर्यवेक्षकों  के पद रिक्त हैं।

केवल यही नहीं उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देशानुसार गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले प्रत्येक परिवार को 35 किलोग्राम राशन प्रतिमाह दिया जाना आवश्यक है,  लेकिन प्रदेश में इन आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुये राशन का कोटा 20 किलो कर दिया गया है। इसके अलावा विगत 4 सालों से सूखा पड़ रहा है और लोगों की आजीविका तहस-नहस हुई है। ऐसे में सरकार ने आजीविका के वैकल्पिक साधनों का विकास नहीं किया है बल्कि रोजगार गारंटी योजना में भी लोगों को काम नहीं मिल रहा है। जिनको काम मिला भी है तो उन्हें 6 महीेनों से मजदूरी नहीं मिल रही है। इस पूरी कवायद में देखें तो राज्य अपनी जिम्मेदारी से दूर खड़ा नजर आता है। यहां बच्चों के अधिकारों का हनन हो रहा है।

जनसुनवाई की तारीख करीब आई तो प्रशासन ने कुछ आंगनवाड़ियों का रंगरोगन करा दिया। कुपोषण से मृत परिवारों को कुछ योजनाओं का लाभ दिलाया गया। कुछ गांवों में रोजगार गारंटी की मजदूरी बंटवा दी गई। लेकिन मूल बात को अभी भी नकारा जाता रहा है। हालांकि अब आयोग ने साक्ष्यों और तथ्यों के बाद मान लिया है कि कुपोषण है और निपटने के प्रयास नाकाफी हैं। आयोग की अध्यक्षा शांता सिन्हा ने कहा कि व्यवस्था में आूमलचूल परिवर्तनों की जरूरत है। समन्वित प्रयासों से ही दूर होगा कुपोषण। व्यवस्था को आगे बढ़कर बच्चों के पक्ष में होने की आवश्यकता है। जब तक सरकार कुपोषण को स्वीकारेगी नहीं तब तक इससे निजात नहीं पाया जा सकता है। पहले सरकार कुपोषण को स्वीकारे, फिर ईमानदार प्रयास करे समस्या से निपटने के, तभी इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है।

यह भी सही है कि प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पहली बार कुपोषण चुनावी मुद्दा बना लेकिन बच्चों को बचाने की राजनैतिक चेतना का अभाव हर स्तर पर दिखता है। हर पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कुपोषण का जिक्र किया है, कांग्रेस ने तो कुपोषण मुक्त प्रदेश  बनाने का संकल्प भी ले लिया था। लेकिन फिर भी बच्चों के पक्ष में बेहतर व्यवस्था बनाने की बैचेनी न तो पक्ष में ही दिखती है और ना ही विपक्ष में । दरअसल यह कुपोषण जितना बच्चों में है उससे ज्यादा व्यवस्था में है। आयोग तो अपना काम कर गया, अब देखना यह है कि यह कुपोषित व्यवस्था कब चेतेगी और सरकारें कब इन बच्चों की जान बचा पायेंगीे ?

प्रशांत कुमार दुबे

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