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मध्यप्रदेश और भारत बच्चों के कुपोषण और कुपोषण जन्य बाधाओं से जूझ रहे समाज हैं। ऊँची कुपोषण और बाल मृत्यु दरें सभ्य समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। विकास संवाद ने खुद के लिए एक जिम्मेदारी तय की थी कि यह कुपोषण के तात्कालिक, आधारभूत और मूल कारणों के परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश करेगा। हम देखेंगे, जानेंगे, समझेंगे और कोशिश करेंगे कि एक व्यापक पहल लागू की जा सके। विकास संवाद में हम मानते हैं कि ऐसा नहीं है कि सरकारी योजनाएं सही ढंग से लागू नहीं हो रही हैं या उनमें खूब भ्रष्टाचार है, इसलिए कुपोषण बना हुआ है।कुपोषण पैदा हुआ क्योंकि हम असमानताओं को दूर नहीं कर पाये, क्योंकि हमने समाजों की अस्मिता को स्वीकार नहीं किया, संसाधनों के वितरण में असमानता आई, विकास के नाम पर संसाधनों का कुछ खास हाथों में केन्द्रीयकरण हुआ, सरकारें और उद्योग मजबूत हुए, किन्तु लोग इतने कमज़ोर होते गए कि उन्हें अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभों को "जीवन यापन का मुख्य स्रोत" मान लेना पड़ा, जबकि सरकार तो हमेशा से पूरक सहायता देने की पहल करती रही। विकास की नीतिओं ने समाज को कमज़ोर किया और उसी का परिणाम है कुपोषण। 

"राज्य" कुपोषण का सचमुच ईमानदार अध्ययन कर ही नहीं पाया है। यही कारण है कि कभी भी वे यह नहीं कहते हैं कि खेती और खेती वाले विभाग को कुपोषण मिटाने में जवाबदेय भूमिका निभाना होगी। राज्य व्यवस्था में सरकारें पीने के साफ़ पानी की व्यवस्था करने वाले विभाग को भी कुपोषण मिटाने की जिम्मेदारी नहीं देती हैं; जबकि यही दस्त/अतिसार/डायरिया का सबसे बड़ा कारण बनता है। क्या शिक्षा विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, वन विभाग का कुपोषण के खिलाफ संघर्ष में कोई स्थान नहीं है? वास्तव में सबकी भूमिका मूल है, पर सरकारों ने इन सबकी साझा भूमिका को कभी विकसित नहीं होने दिया और केवल आंगनवाड़ी के पोषण आहार तक इस मसले को सीमित कर दिया। यही एक बड़ा कारण है कि हमारी सरकारें कुपोषण मिटाने में सफल नहीं हो पायीं हैं। 

हम मानते हैं कि समाज का वर्तमान ताना-बाना एक आदर्श ताना बाना नहीं है। इसमें जाति-वर्ग-लैंगिक-शारीरिक-मानसिक क्षमताओं के भेदभाव-परक मानक विद्दमान हैं। हर तरह का भेदभाव हमारे बच्चों को कुपोषण की तरफ लेकर जाता है। 

महिलाओं की अस्मिता, गरिमा और उनकी बराबर की मौजदूगी को स्वीकार किया जाना और पितृसत्ता के सिंहासन को उठाकर सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक व्यवस्थाओं से बाहर किया जाना भी कुपोषण की समाप्ति के लिए बुनियादी जरूरत है। 

बच्चों को एक अराजनैतिक इकाई मान लिया गया, जबकि लोकतंत्र के मूल्यों के मान से वे पूरी तरह से राजनैतिक इकाई हैं।

हम एक संविधान में विश्वास रखते हैं। और संविधान के मुताबिक "राज्य" की जिम्मेदारी है कि हर व्यक्ति को जीवन का अधिकार मिले, भेदभाव से मुक्ति हो और न्याय का अधिकार भी मिले। सवाल यह है कि क्या राज्य ऐसी नीतियां और क़ानून बना रहा है जिनसे समाज मजबूत हो और आत्म निर्भर बने, हर व्यक्ति को शिक्षा, पीने के साफ़ पानी, स्वास्थ्य सेवाओं, खाद्य सुरक्षा, आजीविका का सम्मान के साथ अधिकार मिले? कुपोषण से ये सभी अधिकार सीधे-सीधे जुड़े हुए हैं।  

इन पृष्ठभूमि में विकास संवाद ने कुपोषण-पोषण के मसले पर व्यापक नज़रिए के साथ शिक्षण-प्रशिक्षण का काम सघन रूप से किया और यह काम अब भी जारी है। समूह 7 राज्यों में लगभग 150 प्रशिक्षण कार्यक्रमों/सत्रों का संचालन कर चुका है। 

विकास संवाद ने तय किया था कि यह समूह सामग्री का निर्माण करेगा। स्थानीय सन्दर्भों में कुपोषण और बीमारियों के चक्र को समझना और उस समझ के आधार पर सामग्री का निर्माण करना ताकि सामाजिक संस्थाओं, कार्यकर्ताओं और मैदानी सेवा प्रदाताओं को सहयोगी सामग्री मिल सके। इस भूमिका को निभाते हुए खाद्य सुरक्षा, पोषण, कुपोषण, स्वास्थ्य और समाज की भूमिका सरीखे विषयों पर केंद्रित होकर विकास संवाद ने 54 प्रकाशन/दस्तावेज तैयार किये। 

समूह द्वारा तैयार किये गए दस्तावेजों का संकलन हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें अपने काम पर विश्वास रहा है और इसीलिए हम मानते भी हैं कि ये प्रकाशन आपके बहुत काम आयेंगे।