क्यों नहीं गलती है हमारी दाल ?

दाल के बिना खाने की थाली पूरी नहीं हो सकती है परन्तु पिछले 18 महीनों में दालें थाली से लगभग बाहर हो गई हैं। इतनी महत्वपूर्ण है दालें पर फिर भी क्यों तुअर दाल 100 रूपये किलो हो गई, उड़द भी 95 रूपये तक पहुंची, मूंग और चना दाल 60 से ऊपर चली गई। केवल स्वाद से ही दूर नहीं हुई बल्कि स्वास्थ्य के लिये भी नई चुनौतियां खड़ी कर देगा दाल का अकाल।

दालों की कमी और उत्पादन में उपेक्षा घातक है। खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में हमें यह समझना होगा कि दालें भारत के लोगों की थाली में प्रोटीन का सबसे अहम् स्रोत है। पारम्परिक और सांस्कृतिक खाद्य व्यवहार के मामले में भी एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक किसी न किसी रूप में दालों की एक सहज स्वीकार्यता रही है। यहा  कुपोषण का एक बड़ा कारण प्रोटीन देने वाले खाद्यान्नों (दलहन) तक लोगों की कम होती पहुंच है। यह पता होते हुये भी हमें दालों की बहुत जरूरत है, भारत में नीतिगत स्तर पर इनके उत्पादन को बढ़ाने की कोषिशे नहीं हुई। इसके एवज में दूसरे देशो से आयात करने में भारत सरकार की हमेशा ज्यादा रूचि रही है।

उत्पादन - वर्ष 1959 में भारत में प्रतिव्यक्ति 74.9 ग्राम दालों का उत्पादन होता था किन्तु 2007-08 में यह गिरकर 35.5 ग्राम पर आ गया। इस दौरान जनसंख्या में दो गुना वृद्धि हो गई परन्तु उत्पादन कम होता गया।

दालों की सिंचाई - उत्पादन बढ़ाने के लिये जरूरी था कि दलहन के लिये सिंचाई का दायरा बढ़ाया जाता। पिछले 40 वर्षों में ऐसा नहीं लगता है कि दालों की महत्ता सरकारें समझ पाई हों। 1970-71 में महज 20 लाख हेक्टेयर दलहन क्षेत्रफल सिंचित था और 2008 में 40 लाख हेक्टेयर जमीन ही सिंचित हो पाई। जरा यह जानिये कि 162 लाख हेक्टेयर दाल उत्पादन क्षेत्र में से अब भी केवल 16.2 प्रतिषत खेती ही सिंचित है।

उत्पादकता - 1970-71 में एक हेक्टेयर में लगभग 539 किलो दालें पैदा होती थी और अब 655 किलो उत्पादन होता है। दालों की उत्पादकता महज 20 फीसदी बढ़ पाई जबकि इस दौरान अनाजों की उत्पादकता 220 प्रतिषत तक बढ़कर 2175 किलो तक पहुंच गई। अब भी इस बात पर सरकार का ध्यान नहीं है कि 1960-61 में एक हैक्टेयर में 849 किलो तूअर पैदा होती थी और 2008-09 में यह घटकर 678 किलो तक आ गई।

तकलीफ का अगला कारण यह है कि पिछले 50 वर्षों में दालों का सकल क्षेत्र बढ़ने के बजाये घट गया। 1960-61 में 236 लाख हेक्टेयर में दालें बोई जाती थीं और 2008-09 में सकल क्षेत्र 224 लाख हैक्टेयर रह गया। हमें हर साल 22 मिलियन टन दालें चाहिये पर 2008-09 में केवल 14.66 मिलियन टन दालें पैदा होने का अनुमान है। सवाल यह है कि क्या दालों के उत्पादन को बढ़ाये बिना स्थाई खाद्य सुरक्षा को हासिल करना संभव है?

भारत खाद्यान्न के मामले में अब आत्मनिर्भर हो गया है। परन्तु इसी दौर में कुछ चैंकाने वाले आंकड़े भी सामने आते हैं। 1980 की तुलना में 1990 के दशक में कृषि उत्पादन में कमी दर्ज की गई। जहा  1980 के दशक में उत्पादन वृद्धि की दर 3.54 प्रतिशत थी वही 1990 के दशक में घटकर 1.92 प्रतिशत पर आ गई। इतना ही नहीं उत्पादकता की दर पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा। 1980 उत्पादक की दर में सुधार की दर 3.3 प्रतिशत थी जो 1990 के दशक में घटकर 1.31 प्रतिशत हो गई है। बहुत संक्षेप में यह जान लेना चाहिये कि 1960 के दषक में हरित क्रांति के दौर में किसानों ने उच्च उत्पादन क्षमता वाले बीजों, रासायनिक ऊर्वरकों, कीटनाशकों और मशीनों का उपयोग करके प्रगति की तीव्र गति का जो रास्ता अपनाया था, अब उसके नकारात्मक परिणाम आने शुरू हो गये हैं। इन साधनों से न केवल मिट्टी की उर्वरता कम हुई बल्कि कृषि की पारम्परिक व्यवस्था का भी विनाश हुआ है। सवाल यह है कि अगर हमने इतना विकास किया है कि उत्पादन 5 करोड़ टन से बढ़कर 20 करोड़ टन हो गया तो प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्ध 1951 में 395 ग्राम प्रति व्यक्ति से बढ़कर केवल 442 ग्राम तक ही क्यों पहुंच पाई?

अब एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ यह है कि सरकार देश की दो तिहाई जनता को खाद्य सुरक्षा का कानूनी अधिकार देने जा रही है, पर संकट यह है कि उसने केवल गेहूं, चावल या अनाज को ही खाद्य सुरक्षा माना है। इसमे उसने दाल को शामिल नहीं किया है, जबकि वह एक महत्वपूर्ण जरूरत है क्योंकि इससे प्रोटीन की जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा हो सकता था। यदि सरकार इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली में शामिल करती तो दालों का भी उत्पादन उसी तरह रिकार्ड तोड़ता, जैसे गेंहूँ और चावल के उत्पादन में भारतीय किसानों ने तोडा है। सच तो यह है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए सरकार द्वारा की जाने वाली खरीदी ने किसानों को गेहूं और चावल उत्पादन करने के लिए खूब प्रोत्साहित किया। यदि दालें भी खरीदी और वितरित की जाती तो उसका उत्पादन भी बढ़ता। इसका मतलब यह है कि पीडीएस को केवल अनाज वितरण की योजना मानना एक भूल है। इस व्यावस्था में किसानों को भी एक व्यवस्थित सहयोग प्रदान किया है। सरकार को दाल का बहिष्कार करने वाली अपनी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए।

सचिन कुमार जैन

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