खाद्य सुरक्षा, भोजन का अधिकार और पोषण की सुरक्षा का मतलब क्या है ?

 खाद्य सुरक्षा

खाद्य सुरक्षा का मतलब है समाज के सभी नागरिकों के लिए जीवन चक्र में पूरे समय पर्याप्त मात्रा में ऐसे विविधतापूर्ण भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित होना, यह भोजन सांस्कृतिक तौर पर सभी को मान्य हो और उन्हें हासिल करने के समुचित माध्यम गरिमामय हों। खाद्य सुरक्षा की इकाई देश भी हो सकता है, राज्य भी और गाँव भी। खाद्यान्न का खूब उत्पादन होने पर अनाज की उपलब्धता तो बढती है परन्तु यह जरूरी नहीं की हर परिवार के पास भी भोजन की उपलब्धता होगी; जब तक कि उसके पास खाद्यान्न हासिल करने के साधन (जैसे रोज़गार या सामाजिक सुरक्षा या सरकारी योजना का संरक्षण) न हो। एक तरह से खाद्यान्न उत्पादन के साथ-साथ उसका सही और समान वितरण की व्यवस्था होना भी बहुत जरूरी है। इसके लिए ही हमारी सरकार किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदती है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी राशन की दुकान से सस्ती दरों पर लोगों को उपलब्ध करवाती है।

 भोजन का अधिकार

भोजन का अधिकार एक व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है। केवल अनाज से हमारी थाली पूरी नहीं बनती है। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए हमें विविधतापूर्ण भोजन (अनाज, दालें, खाने का तेल, सब्जियां, फल, अंडे, दूध, फलियाँ, गुड़ और कंदमूलों) की हर रोज़ जरूरत होती है ताकि कार्बोहायड्रेट, वसा, प्रोटीन, सुक्ष पोषक तत्वों की जरूरत को पूरा किया जा सके। भोजन का अधिकार सुनिश्चित करने में सरकार की सीधी भूमिका है क्योंकि अधिकारों का संरक्षण नीति बना कर ही किया जाता है और सरकार ही नीति बनाने की जिम्मेदारी निभाती है। यदि यह विविधता न हो तो हमारा पेट तो भर सकता है, परन्तु पोषण की जरूरत पूरी न हो पाएंगी। सामान्यतः केवल गरीबी ही भोजन के अधिकार को सीमित नहीं करती है; लैंगिक भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के कारण भी लोगों के भोजन के अधिकार का हनन हो सकता है। पीने के साफ़ पानी, स्वच्छता और सम्मान भी भोजन के अधिकार के हिस्से हैं।

बच्चों और महिलाओं के भोजन का अधिकार

समानता और सम्मानजनक व्यवहार एक बुनियादी शर्त है। जब रिश्ते बेहतर होते हैं तो समस्याओं को हल करना बहुत आसान हो जाता है। पोषण आहार कार्यक्रम को हम केवल आंगनवाड़ी केंद्र की चार-दीवारी के भीतर सीमित न करें। इसमे युवाओं, किशोरी बालिकाओं और पुरुषों को जिम्मेदारी के साथ जोड़ना बहुत उपयोगी होगा। आंगनवाडी के बच्चों और वहां आने वाली महिलाओं के हकों के सिलसिले में हमें इन 5 बातों पर जरूर काम करना चाहिए –

 हर गर्भवती महिला को घर में थोड़े-थोडे समय के अंतराल से कुछ खाने को मिले। अनाज, दाल, फल, नारियल, मूंगफली आदि  मिलना बहुत अच्छा होगा। यह उनका भोजन का  अधिकार है।

  1. जन्म के तुरंत बाद से नवजात शिशु को मान का दूध मिले। यह उनका भोजन का अधिकार है।
  2. 6 माह का होते ही मसली हुई दाल, खिचड़ी, नरम फल मिलें। यह उनका भोजन का अधिकार है।
  3. 2 साल की उम्र होते ही पूरा खाना मिले। यह उनका भोजन का अधिकार है।
  4. जब हम पूरा भोजन कहते हैं तो इसका मतलब है – हर रोज़ उनके भोजन की डलिया में अनाज, दाल, सब्जी, कोई भी एक स्थानीय फल, दूध या दूध से बनी कोई चीज़, खाने का तेल, गुड या शकर और पशुओं से मिलने वाले भोजन (यदि वह समुदाय उसका उपयोग करता है तो) का प्रतिनिधित्व जरूर होना चाहिए। यदि हम इतना कर पाए तो पोषण युक्त भोजन का अधिकार सुरक्षित हो जाएगा। 

 पोषण की सुरक्षा

पोषण की सुरक्षा एक ऐसी स्थिति है जब सभी लोग हर समय पर्याप्त और जरूरी मात्रा में गुणवत्तापूर्ण भोजन का वास्तव में उपभोग कर पाते हों। जीवन को सक्रीय और स्वस्थ रूप से जीने के लिए जरूरी इस भोजन में विभिन्नता, विविधता, पोषण तत्वों मौजूदगी और सुरक्षा भी निहित हो। इसके साथ ही स्वच्छता पूर्ण पर्यावरण, पर्याप्त स्वास्थ्य और उससे जुडी सेवाएं शामिल हैं। (संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य और कृषि संगठन के मुताबिक)

सही नीतियां बनाने और उनके क्रियान्वयन के मकसद से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा और पोषण की अवधारणा को एक साथ उपयोग में लाया जाने लगा है। इन दोनों को एक साथ रखने के पीछे का मकसद यह है कि खाद्य सुरक्षा और पोषण एक दूसरे से जुडी हुई अवस्थाएं और जरूरतें हैं।

सचिन कुमार जैन

 

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