जनगणना 2011 में किसान और खेतिहर मजदूर -मध्यप्रदेश के कृषि विकास का एक यथार्थ यह भी!

मध्यप्रदेश के कृषि विकास का एक यथार्थ यह भी!

मैं इस आलेख में विश्लेषण को कोई निष्कर्ष पर नहीं पंहुचा पाऊंगा. शायद मैं इस सवाल को लेकर दुविधा में हूँ कि खेती के सन्दर्भ में उपलब्ध किये जा रहे आंकड़ों पर विश्वास करूँ या न करूँ. शायद आप लोग मेरी मदद कर सकते हैं. वर्ष 2012 में मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि बजट (यानी कृषि और उससे जुड़े विभागों के बजट को जोड़ कर बजट प्रस्तुत करने की नयी परंपरा) तैयार करने की पहल की. इसी साल राष्ट्रीय किसान संघ (आर एस एस से संबद्ध किसान संगठन) ने 1 लाख किसानों के साथ भोपाल में धरना दिया. जनवरी 2013 में मध्यप्रदेश सरकार को भारत के राष्ट्रपति ने कृषि कर्मण पुरूस्कार से नवाज़ा. खेती का काम और खेती करने वाला यदि जिन्दा रह पाए और उसकी बेहतरी हो तो इससे बेहतर इस समाज के लिए कुछ हो हे नहीं सकता. यह बताया गया कि जिस समय देश में कृषि विकास की दर 2 प्रतिशत के आसपास मंडरा रही थी, तब मध्यप्रदेश में वर्ष 2011-12 में कृषि विकास दर 18.96 प्रतिशत रही. मध्यप्रदेश में दलहन के उत्पादन में 54 प्रतिशत, अनाज के उत्पादन में 43 प्रतिशत, कपास में 10 प्रतिशत और तिलहनों के उत्पादन में बहुत जबरदस्त 143 प्रतिशत की बढोतरी हुई है. हम केवल इतनी तक ही सीमित नहीं हैं. धनिया, मिर्ची, लहसुन, और फलों के उत्पादन में भी जबरदस्त वृद्धि हुई है. वर्ष 2010-11 में खाद्यान्न उत्पादन 160 लाख टन था, जो अगले ही साल बढ़ कर 194.6 लाख टन हो गया. देश के दाल उत्पादन में मध्यप्रदेश का 22.54 प्रतिशत का योगदान है. 4 लाख हेक्टेयर जमीन पर फल-फूल-सब्जियों का उत्पादन होता है. देश का 37 प्रतिशत लहसुन उत्पादन और 54 प्रतिशत सोयाबीन मध्यप्रदेश में होता है. जब आंकड़े आते हैं तो मन की आशंकाएं दब सी जाती हैं. जनवरी 2013 में हमें लग रहा था कि सच में खेती-किसानी यहाँ बच जायेगी.

सचिन कुमार जैन  (विकास संवाद-9977704847)

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