मध्‍यप्रदेश सरकार का बजट: एक विश्लेषण 2017-2018

चहुँ ओर विकास की बयार बह रही है। ऐसा लगता है मानो जो कुछ भी होना था, वह हो चुका; बस जो होना चाहिए था, वही भर न हुआ! भोपाल से हर तरफ खुशहाली भेजी जा चुकी है, बस वह उन गंतव्यों तक पंहुची नहीं है, जहाँ तक उसे पंहुचना चाहिए था। बड दाग लगा हुआ था, इस राज्य पर कि यह एक “बीमारू” राज्य है। कई लोग इसकी परिभाषा भूल चुके होंगे इसलिए याद दिलाना जरूरी है – भुखमरी, बीमारी, बेरोज़गारी, ऊँची मृत्यु दरें, सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा आदि संकेतक “बीमारू” की परिभाषा में शामिल होते हैं। सरकार कह रही है मध्यप्रदेश अब बीमारू राज्य नहीं रहा है, पर कई लोग उस पर विश्वास नहीं करते हैं। अविश्वास का कारण क्या है? सरकार कहती है कि जो लोग नकारात्मक दृष्टि रखते हैं, उन्हें “बदलाव दिखाई नहीं देता”; बस अकसर हलके से वह कह देती है कि अभी शिशु मृत्यु दर और स्वास्थ्य के मामले में हम अब भी पिछड़े हुए हैं। अब अपने यहाँ खुशहाली और विकास की बात नहीं होती। अब हम आनंद की बात करते हैं। मध्यप्रदेश सरकार आंदोलन चला रही है कि सब लोगों को ध्यान करना चाहिए, योग करना चाहिए, आनंद से रहना चाहिए। शायद विकास की नीतियों का नया पहलु यही है कि कुपोषण के दुःख को आनंद में बदला दो, तो समस्या खतम हो जायेगी। रोटी, पोषण और जवाबदेहिता की बात मत करो, इससे दुःख पैदा होता है। इससे राज्य के जीवन में बाधा आती है। राज्य की आनंद में खलल पड़ता है। सच पूछिए तो अब सभी सरकार के दावों को जोड़ कर देखने की जरूरत है।

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