बीमारियाँ, गरीबी-बेरोज़गारी, मानसिक रुग्णता कृषि, शिक्षा और आत्महत्याएं - भारत - 2017

हम एक ऐसे समाज में पैदा हुए हैं, जो अपने अतीत पर लगभग श्रृद्धा रखता है. अपनी सभ्यता, आध्यात्म और अस्मिता पर जिसे गर्व से कम कुछ महसूस नहीं होता. बहरहाल जाति, लैंगिक भेद और असामनता की बेड़ियों की आवाज़ में भी इसे संगीत ही सुनाई देता है. वर्तमान सन्दर्भ में देखें, तो आप पायेंगे कि हमारे समाज का बड़ा तबका हर पल सकारात्मकता से स्नान करता है. वह तेज़ी से बढ़ रहे संकट से छिप कर आगे बढ़ना चाहता है. यहां आत्मविश्लेषण पर आत्मश्लाघा पूरी तरह से हावी है. वास्तव यह वक्त है खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य और युवाओं के जीवन को सम्मान देने वाली नीतियों और राज्य व्यवस्था के निर्माण का. जानते हैं चार क्षेत्रों संकट का स्तर क्या है; जरा देखिये 15 सालों (वर्ष 2001 से 2015) में कितने लोगों ने ख़ुदकुशी की

सचिन कुमार जैन ,विकास संवाद, भोपाल
वर्ष -फरवरी 2017

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