नवजात शिशु मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष : जिन्दगी के पहले 28 दिन

मुख्य बिंदु

  1. भारत में वर्ष 2008 से 2015 के बीच आठ साल में 40 लाख नवजात शिशु मृत्यु.
  2. देश के चार राज्यों (उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार और मध्यप्रदेश) में देश की कुल नवजात मौतों की संख्या में से 56 प्रतिशत मौतें दर्ज होती हैं.
  1. एक महीने से पांच साल की उम्र में बच्चों की मृत्यु का जितना जोखिम होता है, उससे 30 गुना ज्यादा जोखिम इन 28 दिनों में होता है.
  1. इन आठ सालों में भारत में 113 करोड़ बच्चे अपना पांचवा जन्म दिन नहीं मना पाये और उनकी मृत्यु हो गई. इनमें से 62.40 लाख बच्चे जन्म के पहले महीने (28 दिन के भीतर) ही मृत्यु को प्राप्त हो गए. यानी 56 प्रतिशत बच्चों की नवजात अवस्था में ही मृत्यु हो गई.
  2. 5 साल के बच्चों की मृत्यु में वर्ष 2008 में भारत में 9 प्रतिशत बच्चे नवजात शिशु थे, जो वर्ष 2015 में बढ़कर 58.1 प्रतिशत हो गए
  3. भारत के स्तर पर शहरों में नवजात शिशु मृत्यु दर 29 है, जबकि गांवों में 15 है यानी गांवों में मृत्यु दर 9 गुना ज्यादा है. मध्यप्रदेश में यह 1.8 गुना (शहरों में 37 और गावों में 21), उत्तरप्रदेश में 1.7 गुना (शहरों में 20 और गांवों में 34) और बिहार में 1.5 गुना (शहरों में 20 और गांवों में 29) है. सबसे ज्यादा गहरी खाई आँध्रप्रदेश में है, जहाँ गांवों (29) में नवजात शिशु मृत्यु दर शहरों (12) से 2.4 गुना ज्यादा है, इसी तरह राजस्थान में गांवों में (34) यह दर शहरों से (15) 2.3 गुना ज्यादा है.
  4. वर्ष 2014-15 से 2016-17 के बीच बच्चों-महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए भारत सरकार द्वारा 31890 करोड़ रूपए आवंटित किये गए; किन्तु इसमें से 7951 करोड़ रूपए खर्च ही नहीं हुए.
  1. जब महिलाओं को विवाह और प्रजनन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार नहीं है, तो कुछ शर्तें स्वाभाविक रूप से महिला विरोधी हो जाती है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत मातृत्व सहयोग कार्यक्रम का लाभ उन्ही महिलाओं को मिल पायेगा, जिनकी उम्र गर्भावस्था के समय 19 साल है. यह लाभ केवल पहले जीवित जन्म तक मिलेगा. और इसे संस्थागत प्रसव से भी जोड़ा गया है. यदि जनगणना-2011 के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए, तो पता चलता है कि भारत में एक जीवित जन्म शिशुओं वाली महिलाओं का प्रतिशत 6 है, जबकि दो जीवित जन्म शिशुओं वाली महिलायें 28.1 प्रतिशत है, तीन जीवित शिशु को जन्म देने वाली महिलायें 20.8 प्रतिशत हैं. 33.5 प्रतिशत महिलाओं ने चार या इससे ज्यादा जीवित शिशुओं को जन्म दिया है. इसे स्पष्ट हो जाता है कि एक जीवित बच्चे के प्रसव के लिए ही लाभ दिए जाने की शर्त से केवल 31.70 प्रतिशत प्रसवों की स्थिति में ही मातृत्व सहयोग योजना का लाभ महिलाओं को मिल पायेगा.
  1. आठ सालों में 30 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु समय पूर्व जन्म लेने के कारण हुई, यानी 948 हर रोज. विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है कि शिशु का समयपूर्व जन्म मृत्यु और जीवन में किसी न किसी किस्म की विकलांगता का बड़ा कारण है. संगठन के मुताबिक जिन बच्चों का जन्म 36 सप्ताह या 259 दिन की गर्भावस्था अवधि में हो जाया है, उसे “समय पूर्व जन्म (प्री-मेच्यौर बर्थ)” माना जाता है. भारत में अध्ययनों के मुताबिक लगभग 2.6 करोड़ बच्चों का जन्म होता है, जिनमें से 35 लाख बच्चे यानी हर सौ जीवित जन्मों में से 13 बच्चे समय पूर्व जन्मते हैं.

सचिन कुमार जैन
विकास संवाद, भोपाल,
प्रकाशित--अगस्त 2017
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Date of Publication: 30-08-2017

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