मध्यप्रदेश में वन अधिकार क़ानून – 2006

भारत में आदिवासियों और अन्य वन निवासियों के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा के मद्देनज़र भारत की संसद ने अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम – 2006 लागू किया है. यह क़ानून कहता है कि एक निश्चित तारीख के पहले वन भूमि पर कब्ज़ा करके खेती करने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता दी जायेगी. क़ानून कहता है कि ‘औपनिवेशिक काल के दौरान तथा स्वतंत्र भारत में राज्य वनों को समेकित करते समय उनकी पैतृक भूमि पर वन अधिकारों और उनके निवास को पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं दी गई थी, जिसके परिणाम स्वरुप वन में निवास करने वाली उन अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, जो वन पारिस्थितिकी प्रणाली को बचाने और बनाए रखने के लिए अभिन्न अंग हैं;” यह विश्लेषण बताता है कि क़ानून के की गई इस स्वीकारोक्ति की भावनाओं को राज्य व्यवस्था ने महसूस नहीं किया है. जो मकसद था, वह टुकड़े-टुकड़े हो रहा है.

सचिन कुमार जैन
विकास संवाद, भोपाल, 
प्रकाशित- जनवरी 2018
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