21वीं सदी के पूर्वार्ध में बच्चे- भारत में बच्चों के प्रति अपराध

मुख्य निष्कर्ष

बच्चों के प्रति कुल अपराध (दर्ज़)

  • भारत में वर्ष 2001 में बच्चों के प्रति अपराध के 10814 मामले दर्ज थे. जो वर्ष 2016 तक बढ़कर 106958 जो गए. यह वृद्धि 889 प्रतिशत है.
  • इन सोलह वर्षों में देश में बच्चों के प्रति अपराध के कुल 595089 मामले दर्ज किये गए. इनमें से सबसे ज्यादा मामले मध्यप्रदेश (95324), उत्तरप्रदेश (88103), महाराष्ट्र (74306), दिल्ली (59347) छत्तीसगढ़ (31055) में दर्ज किये गए.
  • इस अवधि में कर्नाटक में ऐसे दर्ज अपराधों की संख्या 72 से बढ़ कर 4455 (6088 प्रतिशत), ओड़ीसा में 68 से बढ़कर 3286 (4732 प्रतिशत), तमिलनाडु में 61 से बढ़कर 2856 (4582 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 1621 से बढ़कर 14559, उत्तरप्रदेश में 3709 से बढ़कर 16079 (334 प्रतिशत) और मध्यप्रदेश में 1425 से बढ़कर 13746 (865 प्रतिशत) हो गई.

बच्चों से बलात्कार और यौन अपराध (दर्ज़)

  • बच्चों से बलात्कार और गंभीर यौन अपराधों की संख्या वर्ष 2001 से 2016 के बीच 2113 से बढ़कर 36022 हो गई. यह वृद्धि 1705 प्रतिशत रही.
  • वर्ष 2011 से 2016 के बीच के सोलह वर्षों में भारत में बच्चों के बलात्कार और यौन अपराध के कुल 153701 मामले दर्ज किये गए. इनमें से सबसे ज्यादा प्रकरण मध्यप्रदेश (23659), उत्तरप्रदेश (22171), महाराष्ट्र (18307), छत्तीसगढ़ (9076) और दिल्ली (7825) दर्ज किये गए.
  • इस अवधि में बच्चों से बलात्कार और यौन अपराधों के दर्ज मामलों में कर्नाटक में संख्या 11 से बढ़कर 1565 (14227 प्रतिशत वृद्धि) हो गई. ओड़ीसा में 17 से बढ़कर 1928 (11341 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल में 12 से बढ़कर 2132 (17767 प्रतिशत) राजस्थान में 35 से बढ़कर 1479 (4226 प्रतिशत), उत्तरप्रदेश में 562 से बढ़कर 4954 (881 प्रतिशत) हो गई.

बच्चों का अपहरण (दर्ज़)

  • भारत में वर्ष 2016 में 54723 बच्चों के अपहरण के मामले दर्ज हुए, जबकि वर्ष 2001 में ऐसे दर्ज मामलों की संख्या 2845 थी. इस सोलह सालों में बच्चों के अपहरण के मामलों में 1823 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
  • वर्ष 2016 में बच्चों के अपहरण के 54723 मामलों में से 39842 (73 प्रतिशत) लड़कियां थी. इनमें से 16937 का अपहरण शादी के मकसद से किया जाना दर्ज किया गया है.
  • वर्ष 2001 से 2016 के बीच भारत में 249383 बच्चों का अपहरण हुआ. इनमें 56 प्रतिशत मामले तो केवल उत्तरप्रदेश (45953), दिल्ली (43175), महाराष्ट्र (25626) और मध्यप्रदेश (23563) में ही दर्ज हुए हैं.

बच्चों के प्रति अपराध के अदालतों में लंबित मामले

  • भारत में बच्चों से अपराध के अदालत में लंबित मामलों की संख्या (जिनका परीक्षण पूर्ण बाकी था) वर्ष 2001 के 21233 लंबित प्रकरणों की संख्या सोलह सालों में वर्ष 2016 तक लगभग 11 गुना बढ़कर 227739 हो गई.
  • मध्यप्रदेश में वर्ष 2001 में बच्चों के प्रति अपराध से सम्बंधित 2065 मामले अदालत में परीक्षण के लिए लंबित थे, जो वर्ष 2016 तक बढ़कर 31392 हो गए. यानी केवल अपराध ही नहीं बढ़े, बल्कि लंबित मामलों में ही 1420 प्रतिशत की वृद्धि हो गई. वर्ष 2016 में एक साल में राज्य में कुल 5444 मामलों में परीक्षण पूरा हो पाया और इनमें से 30 प्रतिशत यानी कि 1642 की अपराधी पाये गए.
  • महाराष्ट्र में सोलह सालों में अदालतों में लंबित प्रकरणों की संख्या 3999 से बढ़कर 37125 हो गई. उत्तरप्रदेश में लंबित प्रकरणों की संख्या 275 प्रतिशत बढ़ी और संख्या 10597 से बढ़कर 39749 हो गई. इसी तरह गुजरात में यह संख्या 830 से बढ़कर 12035 हो गई.
  • बच्चों के प्रति अपराध के मामले में परीक्षण पूरा होने के बाद ज्यादातर लोग दोषमुक्त करार दिए जाते हैं. इसका मतलब यह है कि पहले तो जांच-पड़ताल को कमज़ोर किया जाता है और फिर न्यायिक प्रक्रिया के कमजोरियों से आरोपी स्वतंत्र हो जाते हैं. वर्ष 2001 में भारत के स्तर पर 3231 मामलों में न्यायिक परीक्षण पूर्ण हुआ, जिसमें से 1531 (74.4 प्रतिशत) मामलों में किसी को सजा हुई. मध्यप्रदेश में 404 मामलों में परीक्षण पूर्ण हुआ और 157 (38.9 प्रतिशत) मामलों में ही किसी को दोषी करार दिया गया. बिहार में 15 में से 2 (13.2 प्रतिशत, आँध्रप्रदेश में 77 में से 7 (9.1 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 263 में से 37 (14.1 प्रतिशत और दिल्ली में 132 में से 42 (31.8 प्रतिशत) मामलों में कोई दोषी करार हुआ.
  • वर्ष 2016 में ये हालत नहीं बदले हैं. भारत में कुल 22763 मामलों में परीक्षण पूर्ण हुआ, जिनमें से 6991 (3071 प्रतिशत) मामलों में ही किसी को दोषी करार दिया गया. मध्यप्रदेश में 5444 में से 1642 (30.16 प्रतिशत), बिहार में 316 में से 75 (23.73 प्रतिशत), आँध्रप्रदेश में 1012 में से 113 (11.17 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 399 (21.6 प्रतिशत) और दिल्ली में 704 में से 294 (41.76 प्रतिशत) को दोषी करार दिया गया.
  • वास्तव में बच्चों के लिए इस समाज और व्यवस्था में कदम कदम पर कांटे ही कांटे बिछे हुए हैं!                

सचिन कुमार जैन 

विकास संवाद
प्रकाशित- 2018

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