गरीबी रेखा का दर्द

सिकरोदा गांव मुरैना जिले के पहाड़गढ़ ब्लॉक में स्थित है। बीपीएल सर्वेक्षण में गांव में कोई भी बंधुआ मजदूर नहीं पाया गया। जब मार्च 2004 में एक शोध दल गांव में पहुंचा तो कई लोगों ने बताया कि वे बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहे हैं। अधिकारियों ने इस सूचना को गलत ठहराया। बाद में जुलाई 2004 को हमने अखबारों में पढ़ा कि गांव से 20 बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया गया। मध्यप्रदेश के 22 लाख परिवारों के लिये गरीबी की रेखा एक ऐसी रेखा है जो गरीब परिवारों के ऊपर से और अमीर परिवारों के नीचे से निकलती है। वास्तव में अब गरीबी की राजनीति तमाम दूसरे मुद्दों की तुलना में है तो बहुत महत्वपूर्ण किन्तु हमारा राज्य इस गरीबी को देखने के लिये तैयार नहीं है। वास्तव में जिस तरह खूबसूरती को देखने के लिये एक खास तरह की नजर की दरकार होती है; ठीक वैसे ही गरीबी देखने वालों की मंशा और राजनैतिक इच्छाशक्ति होने पर ही नजर आती है।

इसके बाद सर्वेक्षण प्रक्रिया ने भी लोक अधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। सबसे पहले तो सरकार ने आदेष जारी किया कि ऐसे परिवार जिन्हें भरपेट खाना नहीं मिलता है या जो बंधुआ मजदूर है, उन्हें गरीब माना जाये, पर ऐसा हुआ नहीं। सर्वेक्षणकर्ताओं द्वारा बरती गई उपेक्षा का स्तर इतना ऊंचा था कि उन्हें या तो अंदरूनी और दुर्गम गांवों तक जाने की तकलीफ ही नहीं उठाई या फिर किसी संपन्न परिवार के आंगन में बैठकर पूरे गांव के फार्म भर लिए। इस विसंगति के कारण कई वास्तविक गरीब सूची में आने से वंचित रह गये। इसके लिये सरकार ने व्यवस्था की कि ऐसे वंचित परिवार अपने नाम का दावा पेश करें और किसी दूसरे नाम पर आपत्ति करके नाम कटवायें। यहां गलती सरकारी अमले ने की परन्तु गांव में सम्पन्न व्यक्तियों से दुश्‍मनी और झगड़ा मोल लेने की सजा गरीब परिवारों को दे दी गई। इसके बावजूद मध्यप्रदेश में 11.42 लाख लोगों ने अपने दावे पेष किये और सरकार को मानना पड़ा कि 8.71 लाख लोगों के नाम वास्तव में गरीबी की सूची में मानकों के अनुसार 44.77 लाख परिवारों के नाम इस सूची में होना चाहिये यानी 25 फीसदी नाम गलत दर्ज हुये हैं। जन संगठनों के एक अध्ययन के मुताबिक केवल 37 प्रतिशत लोगों ने ही दावे पेश किये हैं यानी दूसरे अर्थ में 25 लाख से ज्यादा परिवार इस लापरवाही के शिकार हुये हैं। 

भारत सरकार की एक नीतिगत प्रक्रिया के तहत राज्य सरकारें अपने क्षेत्र में रहने वाले गरीब परिवारों की पहचान का काम करती है। किसी भी राज्य सरकार को अपने राज्य में गरीबी का स्तर मापने और उसके अनुरूप विकास योजनायें चलाने का अधिकार नहीं होता है। मध्यप्रदेश में कितने परिवार गरीब है। यह संख्या केन्द्र सरकार विष्व बैंक जैसे अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के दिश-निर्देशों( इसे दबाव कहना ज्यादा बेहतर है) में तय करती है जिनकी नजरों में गरीबी का रूप और पीड़ा को देखने का अहसास पैदा करने वाली कोशिका खत्म हो चुकी है। विडम्बना यह है कि सरकार (जिसे हम जनकल्याणकारी राज्य कहते हैं और संविधान के अनुसार हर व्यक्ति के जीवन के बुनियादी अधिकारों की रख्ज्ञा और संरक्षण करने का दायित्व राज्य का होता है) अब घोषित रूप से समाज को गरीबी की रेखा के माध्यम से दो भागों में बांट चुकी है और अब जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन केवल उन परिवारों के लिये किया जाता है जो सरकार की परिभाषा के अनुरूप  गरीबी की परिभाषा पर खरे उतरते हैं । 

सरकार ने यह बंटवारा तो कर दिया पर दस सालों में यह सुनिष्चित नहीं कर पाई कि समाज के सभी गरीब परिवारों को एक मानवीय नजरिये और न्यायपूर्ण प्रक्रिया से पहचान की जा सके। 1997-98 में जब यह सर्वेक्षण पूरा हुआ तो देष के हर गांव में एक समानता जरूर नजर आई और वह समानता यह थी कि सरकार के मुलाजिमों (गरीबी के पहचानकर्ताओं) ने गांव के भू-स्वामियों, ट्रेक्टर मालिकों, भवन मालिकों और सत्ता सम्पन्न परिवारों के नाम गरीबों की सूची में सबसे ऊपर रखे। और चूंकि सरकार यह पहले से ही तय कर देती है कि हमें एक निश्चित सीमा में ही परिवारों की पहचान करना है, तो स्वाभाविक रूप से वास्तविक गरीब परिवार इस सूची में शामिल ही नहीं हो पाये और सरकार के संवैधानिक संरक्षण से वंचित रह गये। इसके ठीक पांच साल बाद सरकार ने यह घोषणा कर दी कि देष में दस फीसदी और मध्यप्रदेश में साढ़े पांच फीसदी गरीबी कम हो गई है। यह घोषणा मानवविकास के संदर्भ में सबसे अमानवीय घोषणा मानी जा सकती है क्योंकि हाल ही में भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (तीन) के आंकड़े गरीबी कम होने के उसी के दावे को झुठलाते हैं। लगभग आठ साल (1998-2006) की अवधि में मध्यप्रदेश में खून की कमी की शिकार महिलाओं की संख्या 48 प्रतिशत से बढ़कर 58 प्रतिशत हो गई है, आज भी केवल 14.9 प्रतिशत नवजात बच्चों का जन्म के तत्काल बाद मां का दूध नसीब हो रहा है। (क्योंकि मांओं के साथ भेदभाव और उनकी खाद्य असुरक्षा अब भी एक बड़ी चुनौती है) और एनीमिया के षिकार बच्चों की संख्या 71.3 प्रतिषत से बढ़कर 82.6 प्रतिषत हो गई है। अगर गरीबी कम हुई है तो मध्यप्रदेश में कुपोषण और एनीमिया में क्यों वृध्दि हुई है ?

योजना आयोग और सरकार भी राष्ट्रीय न्यादर्ष सर्वेक्षण संगठन(एनएसएसओं) के आंकड़ों में ही विष्वास करती है। यही संगठन कहता है कि प्रदेश के 50 फीसदी किसान कर्जदार हैं और हर किसान के ऊपर औसतन 20 हजार रूपये का कर्ज है। तकलीफदेय सच्चाई यह है कि आज भी स्वास्थ्य का मुद्दा मानव विकास का राजनैतिक सूचक नहीं बन पाया है। सरकार ने भी गरीबी की रेखा सर्वेक्षण के सूचकों में इसे शामिल नहीं किया जबकि मध्यप्रदेश में आज भी स्वास्थ्य के ऊपर खर्च होने वाले 100 रूपये में से हर व्यक्ति को 75 रूपये अपनी जमा पूंजी या आय में से खर्च पड़ते हैं; सरकार केवल 25 रूपये का भाग वहन करती है और वह भी अनुत्पादक मदों में ही खर्च होता है। सूचकों के संदर्भ में घरों में शौचालय होने का सवाल एक बड़ी चुनौती बन कर सामने आया है और चार प्रतिशत गरीबी का स्तर इससे सीधे प्रभावित हुआ है। 

सर्वोच्च न्यायालय में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज द्वारा दायर जनहित याचिका में भी न्यायालय ने माना कि बहुत से परिवार गरीब होने के बावजूद गरीबी की सूची में शामिल नहीं किये गये हैं। साथ ही यह निर्देश दिये गये कि जितने भी वृध्द, विकलांग, गर्भवती महिलायें और पिछड़ी हुई आदिम जनजाति के परिवार हैं और जिनके नाम गरीबी की रेखा की सूची में नहीं हैं उन्हें अतिगरीबी की अन्त्योदय अन्न योजना का लाभ दिया जाये। यानी यह एक तरह की स्वीकारोक्ति है कि सबसे वंचित और बहिष्कृत परिवार सरकार की नजरों से उपेक्षित है। जब मध्यप्रदेश में इन परिवारों को योजना का लाभ देना शुरू किया गया तो अन्त्योदय अन्न योजना के हितग्राहियों की संख्या 5 लाख से बढ़कर 15.81 लाख तक पहुंच गई। यानी 11 लाख परिवार अति गरीब हैं पर सरकारी परिभाषा में गरीब नहीं हैं। समग्रता में दावा-आपत्ति करने वाले और सर्वोच्च न्यायालय से इंसाफ पाये पारिवारों को जोड़ें तो पता चलता है कि लगभग 22 लाख परिवार गरीब हैं पर पहचान से वंचित हैं। 

ऐसे में राजनैतिक और सत्तामूलक विरोधाभास भी स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आने लगी है। हाल ही में विधानसभा में तो सरकार ने कहा कि जो कुछ भी हो रहा है वह अच्छा हो रहा है और वही हो रहा है जो भारत सरकार ने तय किया है। जो भी शिकायतें आ रही हैं उनका निराकरण किया जा रहा है परन्तु एक राजनैतिक दल के नेता और मुख्यमंत्री की हैसियत को कम महत्व देते हुये सार्वजनिक रूप से शिवराज सिंह चौहान ने 20 दिसम्बर 2006 को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय विपणन विकास केन्द्र के एक कार्यक्रम में मंच पर आसीन रहते हुये स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि भले ही भारत सरकार मध्यप्रदेश में 37 प्रतिशत लोगों को गरीब मानती है पर वास्तव में यहां 60 प्रतिशत से ज्यादा परिवार गरीब हैं। बतौर मुख्यमंत्री यह जानते हैं कि गरीबी के मानकीकरण, पहचान की प्रक्रिया और व्यवस्था की गैर जवाबदेहिता के चलते समाज के एक बड़े तबके की जिन्दगी धीमी मौत में तब्दील हो रही है तो फिर क्या राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वह भरत सरकार की अमानवीय वैज्ञज्ञनिक अवधारणाओं का विरोध करें? वास्तव में यह इस बात का प्रमाण है कि किस तरह नीतियों और राजनैतिक मंशाओं की उपेक्षा के चलते समाज में नित नये सामाजिक-आर्थिक रूप से बहिष्कृत वर्ग पैदा हो रहे हैं।

पिछले दस सालों में ही हमारा समाज अमीर-गरीब-अतिगरीबी की परिभाषा में बंटा और पिछले पांच सालों में में गरीब भी सामान्य गरीब और अति गरीबी की परिभाषा में बंट गया है। नि:संदेह बाजारवादी व्यवस्था की समर्थक सरकार की नजरें अब गरीबी को नहीं गरीबों की पहचान को मिटाने की जद्दोंजहद में जुटी हुई हैं। यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जमीनी स्थिति पर नजर डालें तो यह राजनीति ज्यादा स्पष्ट नजर आती हैं। 1997 में सस्ते राशन का फायदा सरकार ने केवल बीपीएल परिवारों तक सीमित कर दिया और इस एक ही कदम से 55 फीसदी परिवार राशन दुकान के दायरे से बाहर हो गये। आज केवल 1 फीसदी गैर-बीपीएल परिवारों को इससे लाभ मिलता है। अप्रैल-मई 2006 से केन्द्र सरकार ने गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों का कोटा भी कम कर दिया। अब एक परिवार के लिये 35 किलो के बजाये 20 किलो का आवंटन भारत सरकार कर रही है और अन्त्योदय के लिये थोड़ी उदार है। मतलब यह है कि एक साल में राशन की दुकान का फायदा केवल अन्त्योदय योजना के हितग्राहियों तक ही सीमित रह जायेगा। राजनैतिक दलों को समझना होगा कि आज के मानक लोगों को विकास की प्रक्रिया से बाहर निकालते हैं और अगर वे इसका समर्थन करेंगे तो जनता उन्हें नकारने से पीछे नहीं हटेगी।  

सचिन कुमार जैन 

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