संघर्ष के लोगों के अपने-अपने रास्ते

संविधान में मौलिक अधिकारों के प्रावधान से लेकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा योजना और जननी सुरक्षा योजना तक जीवन का हर पल किसी न किसी सरकारी योजना के गुथा-बिथा है. हमारे लिए खूब योजनाएं बनायी गयी है और प्रावधान किये गए हैं; पर इन प्रावधानों को न्याय के सिद्धांत के साथ जोड़ कर परिभाषित नहीं किया जाता है. सरकार नहीं मानती है कि यदि सही देखभाल के अभाव में एक गर्भवती महिला मर जाती है तो यह उसे साथ अन्याय है. इन हक आधारित पहलों में हमेशा यह बात नज़रंदाज़ की गयी है कि यदि लोगों को उनके तयशुदा हक नहीं मिलते हैं तो कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि उसे वह हक मिल जाए और हकों का हनन करने वाले की जवाबदेहिता सुनिश्चित हो. लोग आवेदन देते रहते हैं, अब आप सूचना प्रोद्योगिकी के जरिये अपनी शिकायत सरकार को भेज सकते हो; पर क्या उससे व्यवस्था लोगों के हकों को न्याय के नज़रिए से देखना शुरू कर देती है?  अपना हक पाने के लिए अब लोग उन व्यवस्थाओं में विश्वास नहीं करते हैं, जिनका प्रावधान हमारा राज्य करता है; क्योंकि उन्हे अब पता है कि सरकार ऐसी व्यवस्था बनाती है जिससे उसके आराम में खलल न पड़े और उसके शोषण करने के विशेषधिकार सुरक्षित रहें. पर समाज मरे हुए लोगों का समूह नहीं है. वह सोचता है, समझता है और उठ खड़ा होता है. तब उठा खड़े होने के उसके अपने तरीके होते हैं. इस आलेख को देखिये - 

1980 में मुंबई की कपडा मिलों में 3 लाख लोग काम करते थे, अब 20 हज़ार रह गए हैं. 1981में मुंबई (तत्कालीन बम्बई) की 80 से ज्यादा कपडा मिलों के मजदूरों ने अपने बेहतर वेतन, स्वास्थ्य और आवास के हकों के लिए संघर्ष करना शुरू किया. इस पर संवाद हुआ. मांगें नहीं मानी गयी. 18 जनवरी 1982 में 2.50 लाख मजदूरों ने हड़ताल शुरू की. हड़ताल दो साल से ज्यादा समय चली और इस दौरान 1.50 लाख मजदूरों का रोज़गार छीन लिया गया. इसके बाद वक्त, मानसिकता और मिल मालिकों की प्राथमिकताएं बदलती गई. १९९० के बाद से ही उन्हे लगने लगा कि मिल के उत्पादन से ज्यादा आर्थिक लाभ तो जमीन के व्यापार में है, सो वे मिलें बंद करने की सोचने लगे. हर मिल में लगभग 9000 मजदूर काम करते थे. अकेले गीरन गांव में 57 मिलें थीं. ज्यादातर मिलें  कार्यस्थल की सुविधाएँ और वेतन कम करके मजदूरों का शोषण शुरू कर दिया गया. जिन चाव्लों (मुंबई में एक इमारत में 50 से 200 या 300 तक ऐसे कमरें होते हैं, जिनका आकार 80  से100 वर्गफुट तक होता है. इसी में रसोई भी होती है और यहाँ ६ से 10 लोगों का परिवार रहता है) में वे रहते थे, उन  चाव्लों को भी हटाये जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी. वर्ष २००९ में २ लाख से ज्यादा मजदूरों ने फिर संघर्ष शुरू किया और हड़ताल हुई. यह हड़ताल अब तक यानी जून 2013 तक जारी है. कई मजदूर गांव चले गए, कई फुटपाथ पर सब्जी बेंच रहे हैं और कई मर गए पर सरकार और मिल मालिक उन्हे ऐसी स्थिति में ले जा रहे थे, जहाँ वे और उनका विश्वास टूट जाए. कहानी लंबी है, पर बात इतनी सी है कि 3 लाख मजदूर परिवारों की जीवन दाँव पर लगाकर प्रभावशाली व्यापरियों, मुंबई के राजनीतिज्ञों और अफसरशाही ने 50 हज़ार करोड़ का व्यापार किया. मजदूरों को पानी, घर, इलाज़, रोज़गार सबके लिए मोहताज़ कर दिया गया. मजदूरों ने अहिंसक तरीके से प्रतिरोध दर्शाया पर लोकतंत्र ने उसे अनसुना कर दिया. आप ही बताइये क्या विकल्प हैं इनके पास ?

उत्तराखंड में 70 के दशक में जंगल बचाने के लिए एक बहुत ही चर्चित संघर्ष हुआ था. क्रिकेट और टेनिस के बल्ले बनाने वालों के पक्ष में सरकार ने पहाड़ों के जंगल में मिलने वाली खास किस्म की लकड़ी के लिए पेड़ काटने की अनुमति दे दी थी. वन विभाग भी 

ठेकेदारों को खुली छूट दी. कंपनी ने अपने काम के लिए जंगलों के लिए खूब कटाई की. इसी जंगल से स्थानीय महिलायें आजीविका की जरूरत पूरा करने और चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी लेती थीं. जंगल की बेतहाशा कटाई से फर्क यह पड़ा कि पहाड़ में बसे गावों की महिलाओं को घरेलु उपयोग के लिए लकड़ी और लघु वन उपज लाने में लगने वाला समय धीरे-धीरे बढ़ने लगा. उन्हे दिन का ज्यादातर समय जलाऊ लकड़ी लाने के काम में खपाना पड़ता था, क्योंकि जंगल कटता जा रहा था. उन्हे समझ आया कि यह संकट आर्थिक लाभ के लिए की जा रही जंगल कटाई के कारण पैदा हुआ है और उन्होंने इसका विरोध करने का निर्णय लिया. तर्क यह था कि जंगल उनके अपने जीवन के ज्यादा महत्वपूर्ण है. यह जंगल काटना है तो पहले उन्हे काटना होगा. वे पेड़ों से चिपट कर खड़े होने लगे और कंपनी-ठेकेदारों को पेड़ काटने से रोकने लगे. यही आंदोलन चिपको आंदोलन कहलाया और समाज की पर्यावरण के प्रति चेतना को इतनी गंभीरता से उभरा कि उत्तरांचल में जंगल कटाई को रोकना पड़ा. उनके लिए यह राजनीतिक और आर्थिक से ज्यादा आध्यात्मिक मामला था. 

वर्ष 2012 में मध्यप्रदेश के कटनी जिले में वेलस्पन नाम की कंपनी के थर्मल पावर प्लांट के लिए खेतों और सार्वजनिक जमीनों को कब्जाना शुरू किया. मध्यप्रदेश सरकार भी उसके साथ थी. जिले के बुज्बुजा और डोकरिया गांव में यह कंपनी 7360 करोड़ रूपए की लागत से 1980 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट स्थापित कर रही है. इस परियोजना में 1690  एकड़ जमीन खपना है, जिसमे से 1402 एकड़ खेती की जमीन है. सरकार से साढे चार एकड़ जमीन के अधिग्रहण के नोटिस ने 45 साल की सुनिया बाई की जान ले ली. इन दोनों गांव के लोगों ने फिर चिता सत्याग्रह शुरू किया. इस संघर्ष में उन्होंने अपने खेतों में चिता सजाई और उस पर बैठ गए. सन्देश साफ़ था जमीन और संसाधन जीवन के ज्यादा महत्वपूर्ण हैं और चुपचाप समर्पण करने से बेहतर है जीवन होम कर देना. ऐसा नहीं है कि संघर्ष का यह तरीका उनका पहला विकल्प था. दुखद यह है कि सरकार खुद नियमों का पालन नहीं कर रही थी और दोनों गाँव के लोगों की आपत्तिओं को उन्होंने पहले की दफना दिया था. लोग जानते थे कि जमीन के बिना उनका जीवन भी तिल तिल करके खत्म हो जाएगा. जीवन में सम्मान न बचेगा और उन्हे गुलामों की जिंदगी जीना पड़ेगी. इस अहसास ने उन्हे संघर्ष करने की ऊर्जा दी. 

बडवानी में मनरेगा के लिए संघर्ष कर रहे संगठन जागृत आदिवासी दलित संगठन की सक्रीय कार्यकर्ता माधुरी से मुक्ति पाने के लिए जिला प्रशासन ने उन्हे जिला बदर करने के नोटिस कारी कर दिए. उन्हें बडवानी और आस पास के ६ जिलों से दूर रहने की ताकीद कर दी गयी क्योंकि वे जिला प्रशासन-राजनीतिज्ञों के गठजोड़ और उनके भ्रष्टचार के कुकर्मों को सामने ला रही थीं. तब बडवानी के भील-भिलाला आदिवासियों ने सवाल पुछा कि सरकार और प्रशसन का काम है कि मनरेगा का सही क्रियान्वयन हो; संगठन इसी की मांग कर रहा है; पर भ्रष्टाचार करके सरकार अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रही है तो माधुरी को नहीं जिला प्रशसन को जिला बदर किया जाना चाहिए और आदिवासियों ने जिला प्रशासन को जिला बदर के नोटिस दिए.

मध्यप्रदेश सरकार बड़े बांधों के कारण विस्थापित हो रहे आदिवासियों और किसानों के पुनर्वास में रूचि नहीं रखती है. यही कारण है कि बरगी बाँध के निर्माण से शुरू हुए शोषण और जबरिया बे दखली की प्रक्रिया आज १९ बांधों के निर्माण के दौरान भी जारी है. ओंकारेश्वर और महेश्वर नर्मदा बांधों में पानी के भराव को सरकार बढ़ाना चाहती थी पर इस ज्यादा भराव के कारण डूबे वाले घरों, जमीन, जंगल और समाज के पुनर्वास के प्रति वह पूरी तरह से उदासीन थी और है. जब उन बाँध प्रभावितों की पीढा और दुःख की आवाज़ नहीं सुनी गयी तब खंडवा और हरदा जिले में 300 आदिवासी-किसान नर्मदा के पानी में उतर गए. ये लोग 18 दिन तक ठुड्डी तक अपने शरीर को पानी में डुबो कर रखे हुए थे. 18 दिन बाद सरकार ने कुछ सुना और वायदा किया कि उन्हे जमीन के बदले जमीन दी जायेगी. लोगों ने सरकार पर विश्वास किया पर सरकार ने उस वायदे को ठोकर मार दी.

वर्ष 2008 में झाबुआ की पेटलावाद तहसील में आदिवासी बच्चे मांग कर रहे थे कि उनके यहाँ के स्कूल में दीवारों के अलावा शिक्षक भी हों. 30 आवेदनों के बाद भी वहाँ का स्कूल शिक्षक विहीन रहा. तब बच्चों ने एकलव्य-और गुरु ड्रोन की कहानी दोहराई. उन्होंने एक शिक्षक की मिट्टी की मूर्ति बनायी और अपने सकूं में उसकी स्थापना करके शिक्षा शुरू कर दी. इसके बाद सरकार ने दूसरे गांव के स्कूल के शिक्षक की नियुक्ति इस गांव में कर दी. दूसरे गांव का स्कूल शिक्षक विहीन हो गया. 

हम हमेश से जानते थे कि स्वतंत्र भारत के सामने जातिगत, ढांचागत और विकासगत समस्याएं क्या थीं; पर यह भी सच है कि संविधान के क्रियान्वयन और सरकार के चरित्र को बनाते समय हमें समस्याओं की अपनी जानकारी और समझ के प्रति सोच और विचार को कुंद करके रखा. हमने सच्चाई को स्वीकार करने में ईमानदारी नहीं बरती. देश के प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति से लेकर मंत्री, कलेक्टर, तहसीलदार, पुलिस कर्मचारी, पटवारी और सरपंच तक  हर कोई एक संवैधानिक पदधारी होने से पहले या तो हिंदू होता है या मुसलमान, ब्राह्मण होता है या दलित, पुरुष होता है या औरत; यानी यह केवल संविधान का मुखौटा ओढ़ता है. वह अपनी किसी एक सत्ता का निर्माण करता है और उसे बरकरार रखने या उस ताकत से और ताकत को अर्जित करने के लक्ष्य को लेकर चलता है. बस यही कारण है कि संविधान और न्याय के राज के सिद्धांत को वह दिन भर में कई बार कुचलता है. हमने एक समतामूलक समाज के निर्माण के लिए एक रास्ता चुना और तय किया कि शोषण और असमानता को खतम करने के लिए एक व्यावस्था बनायी. जो ज्यादा वंचित हैं, उन्हे तुलनात्मक रूप से ज्यादा फायदा देना, ताकि वे बराबरी पर आ सकें. यह तय करना कि उनके साथ कोई और शोषण न हो और उन्हे बराबरी का दर्ज़ा मिले. कोई ऊँचा, कोई नीचा न हो. हम भेदभाव के हर संकेत को मिटाना चाहते थे, पर हमने अपनी इस चाहना के खिलाफ हर काम किया.

हमने दलित और औरत के खिलाफ होने वाले अत्याचार की पुलिस रिपोर्ट नहीं लिखी, हमने संसाधनों की लूट करने वालों के लिए नीतियां और तंत्र बनाया, हमने बलात्कार की शिकार लड़की को न्याय दिलाने के बजाये, उसे ही बदचलन करार देने का काम किया, न्यायालय ने न्याय की प्रक्रिया को जीवन के दो गुना लंबा कर दिया, हमने ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनायी ताकि शिक्षित गुलाम पैदा किये जा सकें, जो स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का मतलब न समझते हों; और भी बहुत कुछ किया हमने. मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि लोकतंत्र में जो कुछ भी होता है, उसमे लोगों की सहमति होती है. मैं यह नहीं कहूँगा कि सरकार ने ऐसा किया. देश अब 65 साल का अनुभवी देश है. जो यह जान चुका है कि शिकायत दर्ज किये जाने से पहले जाति का महत्व देखा जाता है, जिसे संविधान ने अधिकार संपन्न बनाया है वह शिकायतकर्ता औरत के शरीर का पूरा जायजा लेता है, यह देखा जाता है कि जिसका शोषण हो रहा है, उससे और क्या छीना जा सकता है – धन, धातु, संसाधन, अस्मिता, आत्मसम्मान और यहाँ तक की उसके बचे रहने की संभावनाएं भी छीन ली जाती हैं. हमारी सरकार ने कागज़ में एक नागरिक संहिता बनायी है, संविधान में सभी भूमिकाएं और जिम्मेदारियां तय हैं.

हर दफ्तर में लिखा है कि शिकायत का तत्काल निराकरण होगा; पर कहीं पर भी यह दर्ज नहीं है कि लोगों को २० दिन पानी में ठुड्डी तक डूब कर खड़े रहना होगा तभी उनकी बात सुनी जायेगी, संविधान और वन संरक्षण क़ानून भी नहीं कहता कि जंगल का विभाग जंगल काटेगा और यदि आपको जंगल बचाना हो तो आपको पेड़ और कुल्हाड़ी के बीच अपने आप को रख देना होगा. संविधान यह भी नहीं कहता कि तुम्हारे स्कूल में शिक्षक नियुक्त नहीं किया जाएगा और तुम गिदगिड़ाते रहोगे और सरकार मुस्कुराती रहेगी तब तुम यानी बच्चों मिट्टी के शिक्षक बनाना और पढ़ने लगना....जब शासन व्यवस्था मूल्यों के मार से वंचित हो जाति है और अपने चरित्र से भ्रष्ट हो जाती है तब उसके लिए संविधान के कोई मायने नहीं बचते हैं. उसके लिए सत्ता, ताकत, उपनिवेशवादी नजरिया सबसे ऊपर हो जाता है. तब लोग सरकार को झकझोरने, नींद से जगाने और कभी कभी उसकी ग़लतफ़हमी तो नेस्तनाबूत करने के लिए अपने खुद के रास्ते चुनते-बनाते हैं. वे प्रमाण देते हैं कि सरकार-न्यायपालिका और विधायिका अपने चरित्र से भ्रष्ट हो रहे हैं; पर देश मरा नहीं है. देश देख रहा है और जब भी जरूरत पड़ेगी वह उठ खड़ा होता है और अपना लक्ष्य हासिल कर लेता है. वह अपने इन नवाचारी तरीकों के बता देता है कि उसे सत्ता के हर षड़यंत्र की जानकारी है. यह भी अभी तय किया जाना जरूरी है कि क्या न्याय पाना जीवन का बुनियादी अधिकार नहीं है?

हमारा संविधान कहता है जीवन का अधिकार, समानता अधिकार, शिक्षा का अधिकार, मतदान का अधिकार सब मौलिक अधिकार हैं, पर जब इनका हनन होता है तब हर मामले में अन्याय होता है; पर भारतीय व्यवस्था न्याय को मौलिक अधिकार नहीं मानती है. आखिर में वह बस एक खांचा छोड़ देता है. इसी छूटे हुए खांचे के कारण देश के १०० अलग अलग हिस्सों में चल रहे संघर्ष एक कड़ी के रूप में जुड़ नहीं पाते हैं. अब अगली संभावना यही है कि अपने अपने तरीकों से न्याय का बिगुल बजाने वाले ये लोग एक दूसरे से जुड़ने लगेंगे, तब सत्ता के चरित्र के परिवर्तन का अभियान शुरू होगा और संविधान को पुनर्जीवन मिलेगा; एक नए सन्दर्भ के साथ. 

सचिन कुमार जैन 

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